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उड़ने वाली जादुई साइकिल – हिंदी कहानी | Flying Magic Cycle – Hindi Story

कहानी :- उड़ने वाली जादुई साइकिल
कई साल पहले रामपुर नाम के गांव में रामलाल नाम का एक गरीब आदमी रहता था | और उसका एक बेटा था जिसका नाम था करण था वह हर रोज जंगल के रास्ते नजदीक के गांव के स्कूल में जाता था | और पढ़ाई करके घर वापस आता था | लेकिन उसके मित्रों के पास साइकिल थी  इस कारण है उसे चिढ़ाया करते थे |
उनके चिढ़ाने की वजह से करण हमेशा दुखी हो जाता था | हर रोज वे जिद कर करके स्कूल जाया करता था  | एक दिन करण ने अपने पापा से कहा |
करण :- पापा हर रोज इतना दूर चलते चलते स्कूल में बहुत दिक्कत होती है मेरे सारे दोस्तों के पास साइकिल है मुझे भी साइकिल दिलाई है ना नहीं तो मैं खाना नहीं खाऊंगा स्कूल भी नहीं जाऊंगा |
रामलाल :- रामलाल ने कहा बेटा साइकिल खरीदने की मेरी हैसियत कहां है | बेटा थोड़े दिन और रुक जाओ मैं कहीं से पैसे का इंतजाम करके साइकिल आने की कोशिश करता हूं |
करण :- नहीं पापा मुझे साइकिल किसी भी हालत में चाहिएं यह कहकर करण वहां से चला गया |
बेचारे रामलाल को समझ में नहीं आया अब क्या करें | रामलाल ने अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखें और करण के लिए एक पुराना साइकिल खरीद कर लेकर आ गया |
करण :- छी मुझे यह पुराना साइकिल नहीं चाहिए मैं यह नहीं चलाऊंगा मुझे नया साइकिल चाहिए |
रामलाल :- अपने बेटे को रामलाल समझाता है ऐसा मत बोलो बेटा थोड़े दिन से चला ले बहुत जल्दी मैं तेरे लिए साइकिल लेकर आऊंगा |
दूसरे दिन करण अपनी साइकिल पर जा रहा था | उसके एक दोस्त ने अपनी साइकिल पर जाते हुए करण से कहा यह तो पुराना साइकिल है कहकर हंसने लगा यह तो खटारा है | उसने करण को बहुत चिढ़ाया करण को बहुत गुस्सा आया |
शाम को जब करण स्कूल से घर लौट रहा था | तभी ऋषि पानी में डूब रहा था और वह चिल्ला रहा था बचाओ-बचाओ | करण तुरंत ही पानी में कूद गया और ऋषि को बचाया |
बाद में ऋषि ने करण से कहा |
 
 
ऋषि :- मेरी जान बचाने के लिए धन्यवाद तुम्हें जो वरदान चाहिए मांगो |
बाद में करण ने अपनी सारी साइकिल की कहानी ऋषि को बता दी | यह सुनकर ऋषि ने करण से कहा ?
 
ऋषि :- हंसकर बोले तो तुम्हारे दोस्त तुम्हें बहुत परेशान करते हैं तो तुम्हारी यह समस्या है मैं तुम्हारे साइकिल को उड़ता हुआ साइकिल बना देता हूं | अगर तुम अपने स्वार्थ के लिए उस साइकल को उपयोग करोगे तो तुम्हारे साईकिल की शक्ति कम हो जाएगी समझ गए बेटा यह यह कहकर आशीर्वाद दिया | बाद में साइकल पर पंख आ गए और करण बहुत खुश हो गया | बाद में करण ने ऋषि को नमस्कार किया इसके बाद ऋषि वहां से चले गए |
बाद में बिट्टू जैसे ही साइकिल पर बैठा साइकिल उड़ने लगी | घर पहुंच कर सारी बात करने अपने माता-पिता को बता दी | इसके बाद उसने अपने पिता को साईकल पर बैठा कर हवा में उड़ाया भी |
दूसरे दिन करण ने देखा कि उसके दोस्त साइकिल पर जा रहे थे और करण ने अपने दोस्तों को चिढ़ाया |
करण :- तुम लोग मुझे चिढ़ाते थे कि तुम्हारा नया साइकिल है पर मेरा साइकिल तो हवा में उड़ता है मैं तो तुम लोगों से आगे पहुंच जाऊंगा यह कह कर हंसने लगा और वह वहां से उड़ते-उड़ते निकल गया |
एक दिन उसकी ही तरह चलते हुए एक विद्यार्थी जा रहा था उसने उसके पास रुक कर कहा |
 
 
करण :- करण उस विद्यार्थी से कहता है कि तुम रोज चल कर जाते हो मुझे बुरा लगता है मैं तुम्हें आज के बाद हमेशा घर पर छोड़ दूंगा | और कर्ण ने उस बच्चे को अपनी साइकिल पर बैठा लिया और स्कूल लेकर चला गया |
करण हमेशा स्कूल जाते वक्त पहाड़ों से नदियों से अपने घर के ऊपर से साइकिल उड़ाता था और बहुत खुश होता था | पढ़ाई के ऊपर से उसका ध्यान हट रहा था और घमंड बढ़ रहा था | एक दिन करण ने उस लड़के से कहा |
करण :- सुन मैं हर रोज तुम्हें मुफ्त में लेकर जाता हूं मैं तुम्हें क्यों लेकर जाऊं अगर तुम मुझे कुछ देगा तो ही मैं तुम्हें लेकर जाऊंगा और बाद में उस लड़के ने सारे आम अपने करण के दे दीए |

उसी दिन से उसके मन में लालच आ गया और वह हर किसी से पैसे लेता नहीं तो फल ले लेता साइकिल से जिनको जहां पर जाना उनको वहां पर छोड़ देता | क्योंकि उसका हर काम स्वार्थ से भरा हुआ था | धीरे-धीरे साइकिल की शक्तियां कम होती चली गई | बाद में उसके पंख गायब हो गए साइकिल के साथ-साथ में करण जमीन पर नीचे गिर गया |

यह देख कर सारे उसके दोस्त हंसने लगे और बोलने लगे अच्छा हुआ अच्छा हुआ | बेचारा करण फिर से साइकिल चलाकर स्कूल जाने लगा |
 
 
तो मित्रों इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि इच्छाओं की हद नहीं होती और अपनी चाहत का अंत नहीं होता इन पर काबू ना रखा जाए तो बहुत तकलीफ होती है |

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